5 जून विश्व पर्यावरण दिवस
छत्तीसगढ़ के विकास में पर्यावरण की अनिवार्य भूमिका
भागचंद चतुर्वेदी
“धरती केवल हमारे पूर्वजों की धरोहर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों से लिया गया अमूल्य ऋण है।”
विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि मानव जीवन और प्रकृति के अटूट संबंध को समझने और संजोने का अवसर है। प्रत्येक वर्ष 5 जून को मनाया जाने वाला यह दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि यदि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तभी मानव सभ्यता, विकास और जीवन की निरंतरता संभव हो सकेगी। आज जब विश्व जलवायु परिवर्तन, भीषण गर्मी, जल संकट, वायु प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाओं जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ के लिए पर्यावरण संरक्षण विकास का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन जाता है।
छत्तीसगढ़ प्रकृति की गोद में बसा वह राज्य है, जहाँ घने वन, स्वच्छ नदियाँ, पर्वत, जैव विविधता और आदिवासी संस्कृति एक अद्भुत पर्यावरणीय संतुलन का निर्माण करती हैं। राज्य का विशाल वन क्षेत्र न केवल लाखों लोगों की आजीविका का आधार है, बल्कि देश के पर्यावरण संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यहाँ के वन जलवायु को संतुलित रखने, वर्षा चक्र को बनाए रखने, भूजल संरक्षण तथा वन्य जीवों के संरक्षण में अमूल्य योगदान देते हैं।
छत्तीसगढ़ को “धान का कटोरा” कहा जाता है। कृषि यहाँ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और कृषि पूरी तरह पर्यावरण एवं प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करती है। यदि जल स्रोत सूख जाएँ, मिट्टी की उर्वरता कम हो जाए और मौसम असंतुलित हो जाए, तो विकास की पूरी संरचना प्रभावित हो जाएगी। इसलिए पर्यावरण संरक्षण केवल प्रकृति प्रेम नहीं, बल्कि आर्थिक समृद्धि और सामाजिक स्थिरता का भी आधार है।
आज विकास की दौड़ में तेजी से औद्योगिकीकरण, खनिज उत्खनन और शहरीकरण बढ़ रहा है। छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से समृद्ध राज्य है, जहाँ लौह अयस्क, कोयला, बॉक्साइट सहित अनेक खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इन संसाधनों का उपयोग विकास के लिए आवश्यक है, लेकिन यदि प्राकृतिक संतुलन की अनदेखी की गई तो यही विकास विनाश का कारण बन सकता है। वनों की अंधाधुंध कटाई, जल स्रोतों का प्रदूषण, प्लास्टिक कचरे का बढ़ता खतरा और बढ़ती गर्मी आने वाले समय के लिए गंभीर चेतावनी हैं।
ऐसे समय में छत्तीसगढ़ में संचालित पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी योजनाएँ आशा की नई किरण प्रस्तुत करती हैं। “नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी” जैसी योजनाएँ जल संरक्षण, जैविक खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। वृक्षारोपण अभियान, तालाबों का संरक्षण, वर्षा जल संचयन और जैव विविधता संरक्षण जैसे प्रयास पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में सकारात्मक पहल हैं।
विद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बच्चों में प्रकृति प्रेम, जल संरक्षण, स्वच्छता और पौधारोपण की भावना विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। आज का विद्यार्थी यदि पर्यावरण के प्रति जागरूक होगा, तो आने वाला समाज भी सुरक्षित और संवेदनशील बनेगा।
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार या किसी संस्था का कार्य नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। यदि हर व्यक्ति अपने जीवन में छोटे-छोटे संकल्प ले— जैसे जल बचाना, बिजली की अनावश्यक खपत रोकना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना, अधिक से अधिक पौधे लगाना और स्वच्छता बनाए रखना — तो यह अभियान जनभागीदारी का स्वरूप ले सकता है।
आज विश्व पर्यावरण दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखते हुए छत्तीसगढ़ की हरियाली, जल स्रोतों और जैव विविधता की रक्षा करेंगे। क्योंकि स्वच्छ पर्यावरण ही स्वस्थ समाज, समृद्ध राज्य और सुरक्षित भविष्य की सबसे बड़ी गारंटी है।
“जब प्रकृति मुस्कुराएगी, तभी विकास सच्चे अर्थों में सफल कहलाएगा।”
“पेड़, पानी और पर्यावरण बचाना ही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।” भागचंद चतुर्वेदी राजिम छत्तीसगढ़
