गणेश्वर आजाद "गँवईंहा" कविता - chhattisgarhkaratan

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Monday, 7 December 2020

गणेश्वर आजाद "गँवईंहा" कविता


  पुलवामा के सुरता 
सकपकागे दाई
अंधमंधागे ददा
छाती फाटथे...
ओनहा भींजे लहू
करम फाटगे तोर बहू
काला गोहराववं कका ?
काला बताववं बबा ?
चिर्र-बोर्र जमो लईका सीयान
होगे सगा अब तो...
मरे बिहान...
काय के सुध लमाए रे बैरी ?
सुन ले रे कपटी तोर में का हे सुवारथ ?
रकतबीज कस सपूत उगलथे हमर भारत
हांस झन तैं खाश हमला
तुंहला एक दिन बनाबो कंगला
तुंहर लहू ल बिलोबो मही
अउ खाबो हमन लेवना
तुंहर नाश छैमान होही
तुंहरो हो जाही एक दिन
मरे बिहान...
दउरी फांद के मिस देबो तुंहला
जाता म पीस देबो तुंहला
फरा कस उसन के 
बांट देबो तुंहला
खलबत्ता में कुचर 
शील में पीस के 
चांट देबो तुंहला
देखत हवन हमन
कतको नरसंहार ल ?
टेवना के संग म 
धरे हवन हथियार ल
भभकत हवय दीया
ड़बकत हवय छाती
मुरदा म तुंहरो एक दिन
नाचही हमरो मेछा वाला बराती
सुन ले ना संगवारी
हमरो एक दिन आही पारी
कत्था चुना संग चाब देबो सुपारी
धयना-धीरज धरे हवय धनवान
बाँह भर चुरी नवा-नवा कुरता
थोरको लमाले ग 
पुलवामा के सुरता...
पुलवामा के सुरता...

टीप :- आदरणीय मंच से क्षमाप्रार्थी हूँ कि कुछ कारणवश समय नहीं दे पा रहा हूँ। आप सभी का आशीर्वाद मुझे मिलता रहे इन्हीं कामनाओं के साथ...
                 
   "गणेश्वर आजाद "गँवईंहा"
                 

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