विदित हो कि 10 फरवरी को रायगढ़ के तहसीलदार सुनील अग्रवाल के द्वारा एक प्रकरण के पैरवी के दौरान अधिवक्ता संघ रायगढ़ के सदस्य जितेंद्र शर्मा के साथ दुर्व्यवहार करने एवं उनके विरोध में दिनांक 11 फरवरी 2022 को अनुविभागीय दंडाधिकारी रायगढ़ को जिला अधिवक्ता संघ के द्वारा ज्ञापन सौंपने पर राजस्व कर्मचारियों के द्वारा गाली गलौज मारपीट करते हुए ज्ञापन की कॉपियों को फाड़ कर विद्वेश पूर्ण तरीके से अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अधिवक्ताओं के ऊपर झूठी रिपोर्ट दर्ज करवाने से उपजे विवाद अब भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जंग का रूप ले लिया है इस मामले पर अधिवक्ता एवं समाजसेवी नोटरी हेमंत सिन्हा बताया कि अंग्रेजी शासन काल में राजस्व न्यायालय का गठन भारतीयों को लूटने के लिए किया था क्योंकि अंग्रेजों का एकमात्र मकसद भारतीयों को लूट कर यहां की धन संपदा ले जाना था किंतु यह दुर्भाग्य है कि आजादी के 75 साल बाद भी राजस्व न्यायालय को ज्यों का त्यों संचालित किया जा रहा है जिसकी त्रासदी एक आम आदमी के लिए अभिशाप बन गई है, वर्तमान में आम नागरिकों को अधिकतर राजस्व न्यायालय का सामना करना पड़ता हैं जहां आय जाति निवास भूमि के संबंध में हमेशा काम पड़ता है किंतु आज आलम यह है कि कोई भी राजस्व अधिकारी अपने तनख्वाह पर काम नहीं करता अपितु प्रत्येक काम के लिए रिश्वत की मांग करते हैं और यह बात किसी से छुपी नहीं है बिना रिश्वत लिए वह लोग किसी प्रकरण के पन्ने तक नहीं पलटते और जो भी इस भ्रष्ट व्यवस्था का विरोध करते हैं उन्हें किसी न किसी मामले में उलझा कर झूठी केसों में फंसा दिया जाता है यही वजह है कि आज राजस्व न्यायालय भ्रष्टाचार का हब बना हुआ है जिससे हर व्यक्ति परेशान है यहां तक की सिविल न्यायालय में पारित आदेशों का निष्पादन करने के लिए भी कोताही बरती जाती है हजारों मामले हैं जो बरसों से इन न्यायालयों में लंबित पड़ी है ऐसे में राजस्व न्यायालय के औचित्य पर सवाल उठाना लाजिमी है यही वजह है कि रायगढ़ में अधिवक्ताओं और राजस्व न्यायालय के भ्रष्ट तंत्र के संघर्ष में केवल अधिवक्ता ही नहीं अपितु प्रदेश की आमजन भी बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण है जब रायगढ़ में अधिवक्ताओं की रैली निकली तो रायगढ़ के आम नागरिक उन पर फूलों की वर्षा कर उनका स्वागत किया | हेमंत सिन्हा ने आगे कहा कि एक प्रशासनिक अधिकारी जिसे विधि और विधि की प्रक्रियाओं का कोई ज्ञान नहीं होता और वह स्वयं सरकार का कर्मचारी होता है उनके द्वारा न्यायिक कार्य किया जाना और हर कार्य के लिए एक मोटी रकम रिश्वत के रूप में लेकर दलाली प्रथा को प्रोत्साहन देना आम जन की आजादी के ऊपर प्रहार नहीं तो क्या है ? उस पर भी चोरी और सीना जोरी जो एक राजस्व अधिकारी तहसीलदार कहता है कि सिविल डिक्री नहीं मानूंगा ऐसे में एक अधिवक्ता और नागरिक के पास क्या रास्ता बचेगा ? और यह सब नौटंकी हम सब चुपचाप देख रहे है मै उन तमाम अधिवक्ता साथियों सहित समस्त नागरिकों का तन मन धन से समर्थन करता हूं जो इस भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष कर रहें है