पत्रकार कैलाश टांडे
धमतरी मगरलोड नगर पंचायत मगरलोड मे एक ऐसा वृक्ष देखने को मिला जिसका नाम है कड़क चंपा आपको यहां बता दें कि या वृक्ष समुद्री तट मैं पाए जाते हैं लेकिन हमार मगरलोड मथुरा नगर के खोजी राम दास मानिकपुरी के घर में ए वृक्ष का कॉलम लगा हुआ है यह करीब 10 वर्षों से अपने घर में लगाए गए थे और 10 वर्ष के बाद इसमें फूल और फल भी लगा हुआ है सूत्रों के अनुसार जानकारी मिला है फॉरेस्ट अधिकारी पंचू राम साहू से पूछने पर जानकारी मिला धमतरी जिले के वीर गुड़ी की कैंपस में यह वृक्ष लगाए गए हैं क्या इतना खूबसूरत है इसका पता जो है करीब करीब 2 फीट लंबाई चौड़ाई है की एक थाली के बराबर और सौभाग्य की बात है जो भी देखने के लिए बांग्लादेश काठमांडू उत्तर भारत पाए जाते हैं लेकिन आज हमारे छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के मगरलोड में या विच देखने को मिला खोजी रामदास मानिकपुरी और उसके परम मित्र मदन नगरची इसको देख कर खुश हो गए बताया इसका फूल बहुत सुगंधित एवं औषधि वृक्ष से लेकर फूल पेड़ तक सभी काम में आते हैं
मुख्यतः यह भारत और म्यांमार (बर्मा) में पाया जाता है। हिंदी में ही इसके कई नाम हैं - कनक चंपा, मुचकुंद तथा पद्म पुष्प। बंगाली में 'रोसु कुंडा' तथा सिक्किम में इसे 'हाथीपैला' कहते हैं। इसकी लकड़ी लाल रंग की होती है और इसके तख्ते बनते हैं। कनक चम्पा के वृक्ष को खुशबू के साथ-साथ खाने की थाली के पेड़ के रूप में जाना जाता है। इसके पत्ते ४० से.मी. तक लम्बे होते हैं। तथा दुगनी चौड़ाई के होते हैं। यह वृक्ष ५० से ७० फिट की ऊँचाई तक बढ़ सकता है। भारत के कुछ भागों में इसके पत्ती का प्रयोग बर्तन की जगह किया जाता है। फूल कलियों के अन्दर बन्द होते हैं। कलियाँ पाँच खण्डों में बटी होती हैं। छिले केले की तरह दिखाई देती हैं। प्रत्येक फूल केवल एक रात तक रहता है। मधुर और सुगन्धित होने के कारण चमगादड़ इन फूलों की तरफ आकर्षित होते हैं। पत्ते, छाल चेचक और खुजली की दवा बनाने में इस्तेमाल होते हैं। इसके वृक्ष की लकड़ी से तख्त बनाये जाते हैं। यह वृक्ष पश्चिमी घाट और भारत के पर्णपाती जगलों में पाया जाता है। समुद्री खारा पानी इसके लिए अत्यन्त उपयुक्त होता है