अमीरपुर गाँव
जंगल झाड़ी के बीच भुंईया राहय उंच-नीच बांधा के पार के खाल्हे-खाल्हे म माढ़े राहय जम्मो खेती-खार। रुखराई के मेला माते,अन-धन जम्मो ओनहारी-पाती धरे एक ठन गांव राहय जेकर नांव राहय "अमीरपुर" जिंहा बड़ मुश्कुल ले बीस ठन छानही के परवार मन गुजर-बसर करत राहय।जम्मो घर के बारी-बखरी म अपन-अपन गुजर-बसर करे बर नान-नान कुँवा खने राहय,जेमा बखरी म बारो महीना साग-भाजी हर पुरत राहय अउ उपराहा होवय तउन ल बजार म मढ़ा के बेचय। भंईसा गाय-गरुवा मन ले गांव भर "हेम गाजत" राहय गरुवा-गाय मन के चरागन बर "दईहान" चराये बर चरुवाहा घलो लगवाय जिकर गोबर कचरा ले "घुरुवा" मन के पेट भरे राहय,जेकर ले खेती-किसानी के चोखहा जतन-पानी होवत राहय बारी-बखरी म गोबर के "घुरुवा" म पचे "खातु" हर बड़ माहत्तम होथे कहिथे,कहिके गांव भरके लोगन मन बने चेत-बुध लगाके सबो जिनीस के देख-रेख करय अईसन मजा ले गांव के जिनगानी बिसरत राहय।
गाँव के मंझोत म राहय "बर" अउ "पीपर" के बड़का पेड़ जउन हर पुरखा मनके बड़का चिनहारी राहय जेला सबो गाँव वाला मन सरधा लगाके बझर भर म एक दिन बड़का तीहार बरोबर मनावय,जेकर तियारी आठ-दस दिन पहिली "घर -कुरिया" के लिपई-पोतई, सगा-सोदर मन ल नेवता-हिकारी करके बलावय अउ तीर-तखार के जतका संघरे गाँव के "मनुख" अउ दुरिहा-दुरिहा ले सबो झन आवय अउ बाजा-गाजा म झुमय-नाचय गावय,जेमा पुरखा के मानउता हर बने राहय,के इही "रुख-राई" के परताप ले बखत म झड़ी-पानी,दवई-बुटी,सुघ्घर पुरवाही अउ माटी महतारी ल अपन अचरा म बाँधे राहय।
हावा-पानी,बरसा झड़ी,जरी-बुटी देवत हे दान।
पेट बर दाना,पीठ बर छँईहा,हमर बर इही भगवान।।
"अमीरपुर" गाँव के इही मानउता राहय के जेमा सबो मनखे मन एक बरोबर राहय सबो के दुःख-सुख म काम आवय,जाति-पाती के न "लाम लबेदा" हर बहूँते दुरिहा म फेकाय राहय। एखरे सेति इहि गाँव में धन,सुख-सम्पति एश्बर्य हर दिन-दिन नाँदत रहय,एखरे सेती गाँव के पुरखा मन दान-दया-धरम म बुडे़ राहय,सबो झनके अंग म इहि पर्याबरन बर मया जुरे राहय तेकरे सेति गाँव के नाँव "अमीरपुर" राखे राहय।
समे बीतत गीस अउ धीरे-धीरे दु ल चार अउ चार ले चौहत्तर मनुख मन बाढ़त गीस,बीस ठन छानही हर चालीस चालीस ठन छानही हर अस्सी-सौ ले पार होवत गईन। धीरे-धीरे करत गाँव के रुखराई मन हजावत गईन जंगल-झाड़ी हर खेत-खार म बदले लागीस तबहो ले पुरती नई खावय जने कोति ल देख खाँव-खाँव होवत राहय,कतको धान-चाँउर ओनहारी होवय तबहो ले पुरती नई खावय जंगल-झाड़ी के हजाय ले "बरसा-झड़ी"हर घलो नँदाय लागीस,समे ले दुरिहा होते चलत गईन। काँदी-कचरा ले बने घर-कुरिया मन पथरा,चुना,सिरमीट ले चुक-चुक ले सिरजे लागीस,गली-खोर सड़क मन हर घलो पथरा,चुना,सिरमीट ले सुघराय लागीस जेकर ले पानी सोंखे के रसता मन हलु-हलु मुंदावत गईन।
बड़ सुघराय घर कुरिया ल, थोरको नई धरेच तैं धीयान।
रट ले टुट जाही तोर बाँधे मचान,पाछु पछताबे त का होही मितान।।
गाँव हर तो सुघरागे फेर जउन ठउर ले पानी हर सोंखके भीतरी म जावय तउन रसता मन बँद होगे जेकर ले कुँवा-बउली के पानी हर हबकुन अँटाय लागीस, तब नल,बोरिंग,बोर के माधियम ले पानी के पुरती होय लागीस, समे-घरी दिन बीतत गीस अउ पानी हर थोरउचा होय लागीस तब काय ? करतीस भुँईया ल गहिरा ले गहिरा छेदा-बेदहा कर करके गुजर-बसर होय लागीस दिन-दिन समसिया हर बाढ़त चलत जावत राहय...
**चेत ल धर,सुध ल टमड़ नइते परही बिपत भारी।
कुँवा-बउली ल देख,तरिया बर पानी ल छेक तबहे हमर बुता बनही संगवारी।।**
उही गाँव म एकझन लईका राहय जेकर "चेतन" जेहर बड़ मसखरिहा राहय,ओ हर हर दिन के आधा समे ल बड़का जुन्ना आमा पेड़ के खाल्हे म खेलत राहय पेड़ के पाना ले अपन बर टोपी,फीलफीली बनावय अउ चीचियाके काहय मही इही "जँगल के राजा" हरवँ अउ पेड़ हर घलो "चेतन" ल बने मानय काबर ? के ओकर छँईहा अउ ड़ारा-पाना ल खेलत राहय।
समे घरी बीतत गीस अउ "चेतन" धीरे-धीरे बाढ़े लागीस अउ "गबरु जेवान" हो गईस,फेर पेड़ बर तो ओ हर लईका के लईकच राहय जईसन उमर हर कतको ? बाढ़ जथे तबहो ले दाई-ददा बर लईका ही बने रहिथे,उहि परकार ले "चेतन" हर पेड़ बर लईका बने राहय । धीरे-धीरे करके च"चेतन" हर उही आमा के रुखुवा म आना बँद कर दीस,अउ अपन घर परवार म मगन रहे लागीस। कुछ दिन बिते के पाछु "चेतन" हर उही आमा के रुखुवा के तीर म आय लगे "चेतन" ल अपन तीर म आवत देखके पेड़ के मन बड़ा हरसे लागीस पेड़ हर मने-मन सोचे लागीस के "चेतन" हर बड़ दिन के पाछु मोर तीर म आवत हावय,तब तब तीर म आके "चेतन" हर पेड़ ल कहिथे के मोला कुछु रुपीया पईसा के जरुरत हावय काबर ? के "चेतन" ल अपन बिहाव करना राहय। तब पेड़ हर कहिथे इही आमा के फर हर बहुँते मीठ हवय येला टोर अउ शाहर-पाहर में लेजाके बेचबे त तोला बहुँते आमदनी हो जाही अउ उही पईसा ले तोर अरझे बुता हर सुफल हो जाही। अईसन पेड़ के गोठ ल सुनके "चेतन" थोरकुन घलो देरी नई लगाईस तुरते पेड़ म चढ़ गीस अउ जम्मो पाके-पाके आमा ल हला-हलाके झर्रा डारिस। अउ शाहर-पाहर म लेजाके ओला बेच आईन अउ उही आमदनी के पईसा ले अपन अरझे बिहाव के बुता ल पुरा करीन।काम निकलगे ताहन "चेतन" हर उही रुखुवा के तीर म जाना फेर छोड़दीस,समे-घरी दिन बिते लागीस अउ अपन धुन म मगन "चेतन" हर माते राहय।
एक दिन फेर खिसियावत "चेतन" हर उही पेड़ के तीर म आईस अउ कहिथे मोला गुजर-बसर बर एक ठन घर चाहि रहिस काय ? तैं मोला देहे शकथस,तब उही पेड़ हर बड़ "केंवची-कोंवर" मन ले कहिथे के मोर उपर जतका भी मोटहा-मोटहा डारा-खाँदहा तउन ल काटके ले जा अउ अपन बर "घर-कुरिया" खिरकी,डे़हरी,कपाट,पलंग-सुपेती,जतेक चाही ले जाके बनाले,अईसन गोठ ल सुनके " "चेतन" हर उही रुखुवा के जतका मोटहा-मोटहा डा़रा-खाँदहा राहय तउन ल "गोंदा-गोंदा,कुटी-कुटी" कर डारीस अउ अपन "घर कुरिया" ल तीयार कर डारीन अउ बड़ मजा लगाके दुनों परानी रेहे लागीस। समे घरी दिन बीतत गीस "चेतन" हर अपन धुन म मगन राहय काम के "बखत" उही पेड़ जगा अपन पीरा ल गोहरावय ओखरे पीरा ल देखके पेड़ हर घलो ओखरे कहिना ल मानत जावय अउ "चेतन" माँगय तउन ल देते जावय।
बुता के राहत ले आगु-आगु म तीन परोसा दार-भात।
बुता सिरागे,माथा पीरागे तँहाले छाती म मारथे लात।।**
पेड़ के जम्मो ड़ारा-खाँदहा हर कटागे राहय बीना ड़ारा-पाना के ठुड़गा हर बाँचे राहय,मन सोंचे मन म बिचारे एकेठन ठुड़गा परे राहय फेर चेतन सर काय मजाके थोरकुन उही पेड़ कोति नीहार तो लेतीस नई नीहारै समे-घरी दिन बीते लागीस। फेर उही समे म "चेतन" के घर नान्हे कीलकारी "बेटी" हर जनम लेके आईस,तहाँ ले "चेतन" के मन हर उही लईका के सेवा-सटका म दिन-रात लागे राहय,एक रथिहा के बेरा म लईका हर बीलख-बीलखके रोय लागीस तँहाले दुनो परानी हलकान होय लागीस जईसे- तईसे करके रतिहा ले मुँधरहा होगे तब गाँव के सियान ल देखाईस तब सियान हर कहिथे येला तो "चुरना-सोखउना" के दवा लगाए बर बर परही आमा-मुनगा के गादा ल लानके छाबे बर परही कहिथे। फेर का हे "चेतन" राहय तउन हर फेर उही पेड़ के तीर गईस अउ अपन जुन्ना रोना ल रोय लागीस तब पेड़ हर फेर कहिथे ! ठूँठ भर ह तो भर बाँचे हवय ठुड़गा के छोकला ल छोल अउ लईका के जतन-पानी ल कर कहीस तब "चेतन" हर पेड़ के छोकला ल छोलीस अउ लानके छोकला ल कुचरीस अउ सियान के कहे अनसार लईका के पीलकी म लगाईस दु-चार बखत लगाए के पाछु लईका ल अराम लागीस।समे-घरी बिसरत राहय अउ पेड़ हर बिना ड़ारा-पाना-खाँदहा के सोंच-बिचार करते राहय। अउ तबहे फेर एक दिन "चेतन" हर पेड़ के तीर म आईस तब ओकर उमर हर सियाना होगे राहय पहिली जईसन "गबरू जवान" नई राहय आवत खानी तुरते पेड़ ल कहिथे मोला अउ लकड़ी चाहि जेकर ले मैं खटिया-पाटी पलंग-सुपेती बनाहुँ अउ शोसन भरके सोहूँ । पेड़ हर चेतन ल फेर कहिथे "जा ले जा मोर करा तो अउ कहीँ नई बाँचे हवय ड़ारा-खाँदहा सबो ल तो तैं लेगीगे हावस,"चेतन" ल थोरकुन घलो उही पेड़ बर दया-मया नइ लागीस अउ बाँचे पेड़वा ल घलो काटके लेगीस अउ अपन जरूरत ल पूरा करीस। "चेतन" थोरिक घलो उही पेड़ बर बिचार नई करीस नान्हेपन ले सटका के धरत ले उही पेड़ ले अपन बुता ल बनाईस आखिर म जाँगर तो थकगे राहय सोंचतीस बिचारतीस त काबर ? ओकर दुःख-पीरा के हरईया पेड़ हर सगरो बेरा चेत ल लगाए राहय। समे के राहत ले मन म पहिली बिचार लगाए ले पेड़ के बारा-हाल नई होतीस,तबहो ले पेड़ हर गोहार पारत राहय मोर कोति आ बेटा "चेतन" अउ मोर बाँचे ठुड़गा म बईठ जा जउन हर खोरसी बरोबर हावय येमा दु-चार घरी तो तोल अराम मिलहि हम दुनों झन थोरिक समे बर मगन हो सकथन। ** फेर "चेतन" ह थोथना-माथा ल धरके उही पेड़ के ठूँठ म बईठ गीस तँहाले पेड़ के मन मगन होगे।राम-राम के बेरा म, हमर गाँव म कुकरा बासथे।
अन-धन दोगानी धरे भुँईया हमर हाँसथे।।
डा़रा हे पाना तीर-तीर नीक लागे रुखुवा के छाँव।
धरे लोवा फेर नाँदही अउ बन जाही "अमीरपुर" हमर गाँव।।
आदरणीय मँच समीक्षा हेतु सादर समर्पित ...
गणेश्वर आजाद "गँवईंहा"
सुन्र्दावन-पलारी-बलौदाबाजार(छ.ग.)🙏🙏🏻
